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ईद मुबारक

दुआ करो कि हर इंसान को समझ आए इंसानियत,
ऐ मौला! तेरे हर बंदे की ज़बाँ में आ जाए तहज़ीब।

अहल-ए-जहाँ में छाए प्यार, मोहब्बत की नजाकत,
एक बार फिर से कुदरत की प्रकृति बन जाए जन्नत।

दुआओं की हो इतनी असर कि बदल जाये किस्मत,
हर दुआ क़ुबूल हो…. जिसने दिल से की हो इबादत।

सबको ख़ुशी मिले और पूरी हो जाए हर नेक हसरत,
ए ख़ुदा! इस ईद में मिटा दे सबके बीच है जो नफ़रत।

या अल्लाह! कोई गुमराह न हो करदे तू ऐसी हिदायत,
नमाज़ अदा करें शिद्दत से…मुश्किलों से पाले निजात।

आप सभी को ईद मुबारक🌙🌠

© Jalpa lalani ‘Zoya’ (स्वरचित)

सर्वाधिकार सुरक्षित

शुक्रिया😊

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“यादगार पल” 

याद है मुझे आज भी वो पल 

जब माँ ने कहा तेरे क़दम पड़ते ही 

नये घर रूपी मिला हमें एक फल। 

याद है मुझे आज भी वो पल 

जब हर वक़्त पीछे घुमा करती थी 

पकड़े माँ का आँचल। 

याद है मुझे आज भी वो पल 

जब माँ के साथ जाती थी 

नदी किनारे लेने जल। 

याद है मुझे आज भी वो पल 

जब बापू की फटकार से मिलता था 

गणित का हर हल। 

याद है मुझे आज भी वो पल 

जब बापू रेहते थे हर नियम में अटल। 

याद है मुझे आज भी वो पल 

जब बापू के घर पर न होने पे 

किया करते थे उनकी नक़ल। 

याद है मुझे आज भी वो पल 

जब बहन के साथ छत से निहारती थी बादल। 

याद है मुझे आज भी वो पल 

जब सर्दी की रातों में ओढ़ लेती 

थी बहन का कम्बल। 

याद है मुझे आज भी वो पल 

जब बहन के साथ झूम उठती थी 

मैं भी पहने पायल। 

याद है मुझे आज भी वो पल 

जब भाई के पीछे-पीछे चल 

पड़ती थी मैं भी पैदल। 

याद है मुझे आज भी वो पल 

जब भाई के साथ 

मचाती थी उथल-पुथल। 

याद है मुझे आज भी वो पल 

जब बाहर चली जाती थी 

पहनकर भाई की उल्टी चप्पल। 

याद है मुझे आज भी वो पल 

जब साथ बैठकर खाते थे दाल-चावल। 

याद है मुझे आज भी वो पल 

जब साथ बैठकर देखते थे दूरदर्शन 

जैसे सज़ा हो एक मंडल। 

याद है मुझे आज भी वो पल 

प्यार भरी नींव से बनता है 

मेरा परिवार मुक्कमल। 

हाँ! याद है मुझे आज भी यह सारे पल 

© Jalpa lalani ‘Zoya’ (सर्वाधिकार सुरक्षित)

Note: यह रचना पब्लिश हो चुकी है। यह रचना कॉपीराइट के अंतर्गत है।

धन्यवाद।

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सपनों की बारात

पलकों के रथ पे सवार होकर, सपनों की बारात आ गई
सितारों की चुनरी ओढ़कर, रात दुल्हन सी सज गई

चाँदनी से सजा आसमाँ का मंडप, हवा बजाये शहनाई
बाराती बन बादल झूम रहे, खुशियों की बौछार है छाई

आफ़ताब से सेहरा हटाकर, उम्मीद की किरण है आई
सुबह का हुआ स्वागत, रात की हो गई फिर बिदाई।

© Jalpa lalani ‘Zoya’

शुक्रिया।

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एक ख़त उनके नाम

दिल के कागज़ पे एक ख़त उनके नाम लिख रही हूँ
बेशक़ बग़ैर पते का है वो मुक़ाम, जहाँ भेज रही हूँ

मन में उठते हर सवाल का उससे जवाब मांग रही हूँ
धोखे से मिले ज़ख्मों का, उससे मरहम मंगा रही हूँ

न समझे लफ़्ज़ों की बोली, सिर्फ एहसास जता रही हूँ
सारे रिश्ते नाते तोड़ के उससे गहरा रिश्ता बना रही हूँ

पहुँच जाए ख़त दर-ए-मक़सूद पे, यही राह देख रही हूँ
समा जाऊँ नूर-ए-खुदा में, ख़ुद को काबिल बना रही हूँ।

© Jalpa lalani ‘Zoya’

शुक्रिया।

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बड़ों का साया

तपती धूप में है घने दरख़्त सा बड़ों का साया
ग़म के अँधेरे में हैं ख़ुशियों सा जगमगता दिया

सफ़र-ए-ज़ीस्त में हरदम उसे साथ खड़े हैं पाया
ख़्वाहिश हुई मुकम्मल दुआ में जब हाथ उठाया

सिरातल मुस्तक़ीम का रास्ता उसने है दिखाया
ख़ुशनसीब हैं वो जिसके सर पर है बड़ों की छाया।

© Jalpa lalani ‘Zoya’

शुक्रिया।

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Watch “#shayri #poem सजा-ए-इश्क़ में ऐसा ज़ख्म खाया मैंने Poem by Jalpa Kalani ‘Zoya’ / POETRY STAGE” on YouTube

Hello, friends

Mujhe aap sab ki madad ki aavshyakta hain. YouTube me jaakar mere is video me likes aur comments karen. Aur jitna ho sake mere video ko share karen.

Thank you in advance.😊🙏

© Jalpa lalani ‘Zoya’

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गुरु

अज्ञान का अंधकार मिटाकर, ज्ञान का दीपक जलाता है
उँच-नीच ना देखकर, वो अपना फ़र्ज़ बखूबी निभाता है

सत्य, अनुशासन का पाठ पढ़ाकर, हर बुराई मिटाता है
हर सवाल का जवाब देकर, सारी उलझन सुलझाता है

भटके हुए को राह दिखाकर, वह मार्गदर्शक बन जाता है
स्वयं में आत्मविश्वास जगाकर,लक्ष्य की मंजिल दिखाता है

पाप एवं लालच त्याग कर, धार्मिक संस्कार सिखाता है
गुमनामी से बाहर लाकर, एक नई पहचान दिलाता है

अज्ञानता के भंवर से निकाल कर, नैया पार लगाता है
संचित ज्ञान का धन देकर, सबका जीवन संवारता है

डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन का योगदान सफल हो जाता है
शिष्य बुलंदियों को छूकर, गुरु चरणों में शीश झुकाता है।

© Jalpa lalani ‘Zoya’

शुक्रिया।

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किताब-ए-ज़ीस्त

किताब-ए-ज़ीस्त के असरार खुल रहे हैं,
हर पन्ने पर कहानी के किरदार बदल रहे हैं।

खुशी की स्याही से लिखी हैं कुछ इबारत,
तो कोई कागज़ गम-ए-हयात से जल रहे हैं।

पीले ज़र्द पन्ने की कोने में पड़ी हैं सिसकती,
राज़ बेपर्दा होते ही हर इक सफ़ा मसल रहे हैं।

© Jalpa lalani ‘Zoya’

शुक्रिया।

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जन्माष्टमी

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माँ देवकी ने जन्म दिया, माँ यशोदा का पुत्र कहलाए
एक हाथ में बंसी उसके, दूजे से मटकी फोड़ माखन चुराए

सबका प्यारा नटखट लाला, मैया यशोदा को बड़ा सताए
राधा को जलाने शरारती कान्हा, गोपियों संग रास लीला रचाए

रसिया कान्हा रक्षक बन, सभा में द्रोपदी की लाज बचाए
हर बच्चे को समझाए कृष्ण ज्ञान, तभी जन्माष्टमी सफल हो जाए।

© Jalpa lalani ‘Zoya’

शुक्रिया।

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भाई की कलाई

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प्रेम रूपी राखी जुड़ी जज़्बात के नाजुक धागे से
रेशमी रिश्ते की राखी गुँथी है रक्षा के वचन से
स्नेह के बंधन में बांधी गई एक अटूट विश्वास से
खट्टी मीठी नोकझोंक से बनी सुनहरे प्यारे रंगों से

बड़े इंतज़ार के बाद घर खुशियां लेके बहन आई
कुमकुम, चावल, राखी, मिठाई से थाली सजाई
सूनी थी जो,आज चाँद सी चमके भाई की कलाई
हरख भाई का दिखे, बहन कुमकुम तिलक लगाई

प्यारी बहना को आज भाई ने दिया अनमोल उपहार
दुनिया में सबसे अनोखा है भाई-बहन का प्यार
माँ जैसे करती दुलार, बेटी के बिना अधूरा परिवार
जग के सारे पर्व में सबसे न्यारा है राखी का त्यौहार।

🌸आप सभी को रक्षाबंधन की हार्दिक शुभकामनाएँ🌸

© Jalpa lalani ‘Zoya’

शुक्रिया।

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ईद मुबारक

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ईद के मुक्कदस मौके पर, आज तो आकर मिल जाओ
है दरमियाँ गिले-शिकवे, आज गले लगाकर भूल जाओ
क़ुबूल करके यह रिश्ता, ख़ुदा ने प्यार से इसे है नवाज़ा
रिश्ते में है गलतफहमी की दरार, आज इसे सिल जाओ।

आप सभी को ईद मुबारक🌙🌠

© Jalpa lalani ‘Zoya’

शुक्रिया।

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बहुत कुछ बाकी है

बहुत कुछ बाकी है तेरे मेरे दरमियाँ,
तेरी याद में अभी आँखें भर आती है।

मोहब्बत से ऊँचा नहीं यह आसमाँ,
पर तूने हर दम इसे जमीं से नापी है।

सफ़र-ए-इश्क़ की हुई है शुरुआत,
अभी तो ये सिर्फ़ प्रेम की झांकी है।

बहुत कुछ बाकी है तेरे मेरे दरमियाँ
दूरीमें नज़दीकी का एहसास काफ़ी है।

© Jalpa lalani ‘Zoya’

शुक्रिया।

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नज़रें चुराने लगे वो

हुआ है मलाल अब ख़ुद से नज़रें चुराने लगे वो,
करके गुस्ताखी-ए-जुर्म अवाम से मुँह छुपाने लगे वो।

बिना सबूत सच्चाई साबित नहीं होती अदालत में,
औरों पर इल्ज़ाम लगाके गुनाह पर परदा गिराने लगे वो।

झूठ की चीनी मिलाके सच का कड़वा शर्बत पिया नहीं गया,
आबेहयात में जहर घोलकर सबको पिलाने लगे वो।

अल्लाह के दर पे सिर झुकाकर सजदे में करते है तौबा,
होकर बेख़बर ख़ुदा की नज़रों से राज़ दफनाने लगे वो।

© Jalpa lalani ‘Zoya’

शुक्रिया।

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कोशिश की जाए

कुछ ना करने से बेहतर है थोड़ी सी कोशिश की जाए
धर्म निभाते तंगदस्त को थोड़ी सी बख़्शिश दी जाए

ज़्यादा पाने की चाह में जो पास है उसे ना खो देना
आँख बंद करके सही ख़ुद से कुछ ख़्वाहिश की जाए

थोड़ी ज़्यादा मशक्कत करने से मुक़ाम ज़रूर पायेगा
नई शुरुआत से पहले बड़ो की दुआ, आशीष ली जाए।

© Jalpa lalani ‘Zoya’

शुक्रिया।

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आगाज़-ए-शायरी(शेर-ओ-शायरी)

यकीन है खुदा पर तभी इम्तिहान ले रहा है मेरा

दर्द दे कर रुलाता है, फ़िर हँसाता भी है

बार बार गिराता है, फ़िर उठाता भी है

मैं भी देखती हूँ कि दर्द जीतता है या यकीन मेरा।

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लोग हमे पागल समझते है, हमारी हँसी को देखकर

अब उन्हें क्या पता इस हँसी के पीछे रखते है कितने दर्द छिपाकर।

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जिन आँखों में गहरा झील बसता था

जिंदगी ने है इतना रुलाया

सूख गया है ग़म-ए-समंदर

अब तो अश्क़ भी नहीं गिरता।

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उसने कहा दवाई ले लो ताकि दिल का दर्द कम हो

अब उन्हें कैसे कहे कि दिल के हक़ीम ही तुम हो।

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शेरो-शायरी लिखना हमें कहा आता है

ये तो दिल के एहसास है जो उभर आते है।

© Jalpa lalani ‘Zoya’

शुक्रिया।

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मैं एक पिता हूँ

हाँ! मैं एक पिता हूँ, बाहर से दिखता बहुत सख़्त हूँ
मगर बच्चों की आँख में आँसू देखकर टूट जाता हूँ

हाँ! फ़ोन पर ज़्यादा किसीसे बात नहीं करता हूँ
मगर दिल में सबके लिए एहसास मैं भी रखता हूँ

सबकी मन मर्जी करने नहीं देता, टोकता बहुत हूँ
मगर बच्चों की बेहतरी के लिए ही ये सब करता हूँ

हाँ! जब याद आए बेटी की तो जताता नहीं हूँ
मगर कभी रात के अँधेरे में मैं अकेला रो लेता हूँ

सब कहते है मैं सिर्फ़ अपने लिए ये सब करता हूँ
मगर ज़िम्मेदारियों से कभी मैं भी तो थक जाता हूँ

मेरे जाने के बाद कभी मेरी कमी खलने नहीं देता हूँ
ये एहसान नहीं है, फ़र्ज़ है मेरा क्योंकि मैं एक पिता हूँ।

~Jalpa lalani ‘Zoya’

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सुबह होने वाली है

चाँद की मद्धम रोशनी तले बाहों के बिस्तर में पूरी रात गुजारी है
प्यार भरे लम्स से कोमल कली खिलकर खूबसूरत फूल बन गई है

दो जिस्म के साथ रूह के मिलन की सितारें देने आए गवाही है
दोनों बहक कर इश्क़ में पिघल रहे इस नशे में रात हुई रंगीन है

मिलन की प्यास है अधुरी, सूरज की किरणें धरा को चूमने वाली है
दिल में अजीब सी बेताबी है पर तुम जाओ प्रिये सुबह होने वाली है।

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क्यों जा रहे हो?

ज़िंदगी की जंग से हार कर यूँ मुँह मोड़कर तुम क्यों जा रहे हो?
अँधेरे में जाकर अपने ही अक्स को ख़ुद से क्यों छुपा रहे हो?

दुनिया की भीड़ से दूर सारे बंधन तोड़कर अकेले कहाँ जा रहे हो?
ख़ुद की आँखे बंद करके अपने आपसे ही क्यों नज़रें चुरा रहे हो?

तन्हाई छोड़ इस जहाँ की महफ़िल में तुम अपनी पहचान बनाओ
अँधेरे रास्ते की वीरानगी में उम्मीद की लौ से तुम रोशनी जलाओ

आँखों में है जो अधूरे ख़्वाब मुकम्मल करके उसे हकीकत बनालो
अपनो के साथ मिलकर बेरंग ज़िंदगी में खुशियों के रंग तुम भरलो।

~Jalpa ‘Zoya’

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सुरक्षित रहें

हुआ एक और प्रकृति का कहर, कैसी है ये कुदरत की नाराज़गी
ख़त्म कहाँ हुई कोरोना महामारी, अम्फान तूफ़ान ने मचाई तबाही

बख़्श दे हम सभी को मौला, करते है साथ मिलकर यहीं विनती
भुगत रहे हैं हानि, अब शांत कर इन तूफानों की अफ़रा-तफ़री

ऐ ख़ुदा सब सुरक्षित रहें कर दे ये इनायत, सुन ले ये दुआ हमारी
आपदा की इस मुश्किल घड़ी में, बस साथ है एक रहमत तुम्हारी।

~Jalpa

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आगाज़-ए-शायरी(हिंदी शायरी)

“खुशी” 

मुद्दतों से देख रहे थे राह तेरी 

तू आयी भी तो तब 

जब सफ़र ख़त्म होने को है।

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गलत सोच थी मेरी

दुःख की इमारत मेरी है सबसे बड़ी

जब किया मैंने सफ़र

हर इमारत बड़ी निकली।

◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆

ज़्यादा नही बदला मेरा बचपन

पहले सब रोकते थे

और हम खेलते थे

अब सब खेल रहे है हमसे

और हम रुके हुए से हैं।

◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆

प्यार हुआ पर पूरा ना हुआ 

ख़्वाब देखा पर ज़रा देर से देखा 

मुलाक़ातें हुई मगर अधूरी रही 

जुदा हुए मगर एहसास कम ना हुआ। 

◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆

बाहों में उनके लेते ही हम तो पिघल से गये

पता ही नही चला कब हम उनके इतने क़रीब आ गए।

◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆

अक्सर हमारे पैरों में कांटा चुभना भी गवारा  नही था उनको

अब दिल के ज़ख़्म का भी एहसास नहीं उनको।

~Jalpa

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पावन धरती

सुनो मानव! कुदरत ने पावन धरती सभी जीवों के लिए दी है
धरती पर पाप बहुत बढ़ गए है, ये उसका नतीजा आज मिला है

प्रकृति से जो खिलवाड़ किया है, अब कुदरत नाराज़ हुआ है
बर्बादी अभी कम ही हुई है, ईश्वर ने सबको किया आगाह है

अहम अपना छोड़ो मानव, प्रकृति की नाराज़गी अभी जारी है
अभी भी वक़्त है संभल जाओ, वरना अब हमारी बारी आनी है

इंसान भूल गया इंसानियत है, जानवरों ने इंसानियत सिख ली है
प्रलय आ रहा किस्तों में है, कही प्रकृति अपना आँचल खींच न ले।

~Jalpa

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अनुशासन

रहना है अनुशासन में, करना है समस्या का निवारण

सरकार कर रही निदर्शन, रोक दो सब कार्यक्रम

घर मे रहना ही है अतिउत्तम, साथ में करो मनोरंजन

ख़ुद को करो आइसोलेशन, बस करो थोड़े दिन परिवर्तन

जो भी सेवा में है जुड़े, उन सभी को मेरा अभिनंदन

अपनाए इसे हर मानव, मत करो इसमें ऑब्जेक्शन

सावधानी बरतें,  करे परहेज़, तभी होगा कोरोना नियंत्रण

बनाये रखो संयम, चल रहा है वैक्सीन का परीक्षण।

~ Jalpa

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मंजिल

आज देखो पूरी दुनिया की मंजिल एक हुई है

घर में रहकर भी दुनिया एक रास्ते पर चल रही है

हर देश कोरोना पर जीत हासिल करना चाहता है

सब दुआ में हाथ उठाकर एक ही दुआ मांग रहे है

हम सबका हौसला ही बना आज हमारा सहारा है

रखना है हमें सब्र साथ में ख़ुदा की रहमत भी तो है

धीरे-धीरे करके रास्ता ख़तम होगा और मंजिल पाएंगे

यह मत भूलना सफ़र में कुछ सबक हमें सीखना है।

~ Jalpa

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चल रहे हालात

सोचा चल रहे हालात का कुछ बयां लिखूँ

सामाजिक दूरी या परिवार की नजदीकी लिखूँ

सुनसान रास्ते या धरती को मिला सुकूँ लिखूं

पिंजरे में बंध इंसान या आज़ाद उड़ता पंछी लिखूँ

वीरान मंज़र या चलते मजदूर की कतार लिखूँ

रद्द हुई परीक्षा या ज़िन्दगी में आया इम्तहान लिखूँ

कोरोना के साथ जंग या भूखे पेट की तलब लिखूँ

ठहरी ज़िन्दगी या मौत और ज़िन्दगी में छिड़ी जंग लिखूँ

हिन्दुस्तान पर ताला या खींची हुई लक्ष्मण रेखा लिखूँ

पशुओं पर अत्याचार या इंसान का इंसान पर वार लिखूँ

कुदरत के साथ खिलवाड़ या रक्षकों का बखान लिखूँ

सोचा चल रहे हालात का कागज़ पर कुछ बयां लिखूँ।

~ Jalpa

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खतरे में अस्तित्व

ऐ इंसान! तूने खूबसूरत सी धरा को, बदसूरत है कर डाला

बेजुबां जानवरों पर अत्याचार करने का, मिला है यह नतीजा

यह वहीं सृष्टि है जहाँ साथ रहकर भी, करते थे आपस में झगड़ा

आज देखो दूर रहकर भी, हुआ है एकजुट संसार सारा

हर जीव में है आत्मा बसती, कर रहा है यही कुदरत इशारा

सर झुका दे कुदरत के आगे, लेना है तुझे अब उसका सहारा

देख ए इंसान अभी भी वक़्त है तेरे पास, तू संभल जा जरा

वरना और भी खतरे में, पड़ सकता है अस्तित्व हमारा

जब तक न हो इसका समाधान, बस घर में ही बैठे रहना

इस तरह ही हमारे अस्तित्व को, ख़ुद हमें बचना होगा।

~ Jalpa

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मेरी कविता

कविता पर लिख रही हूँ आज मैं कविता 
कविता पर लिख रही हूँ आज मैं कविता 

मेरी कविता में सिर्फ़ अल्फ़ाज़ नही है 
मैंने बयां किया है मेरा हाल-ए-दिल है 
मेरी कविता में सिर्फ़ पंक्तियां नही है 
मैंने महसूस की हुई एक अनुभूति है 

मेरी कविता में सिर्फ़ संसार का अनुभव नही है 
मेरी ख़ुद की जिंदगी का लिखा मैंने तज़ुर्बा है 
मेरी कविता सिर्फ़ एक कल्पना नही है 
मेरी कविता हर एक मर्ज़ की दवा है 

मेरी कविता सिर्फ़ दुनयावी सौंदर्य नही दिखाती 
प्रकृति से प्रेम, दया, और करुणा है सिखाती 
मेरी कविता सिर्फ़ एक कहानी नही है 
मेरी कविता में बसा मेरा अनुराग है 

मेरी कविता में सिर्फ़ कड़ियाँ नही है 
मेरी कविता जैसे बजती एक तरंग है 
मेरी कविता में सिर्फ़ लय, छंद नही है 
मेरी कविता माँ सरस्वती की प्रेरणा से है। 

~ Jalpa

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कोरोना

इक और आविष्कार किया खाने के शौकीन चीन ने
सीमाओं से निकलकर खतरा फैलाया पूरे विश्व में

तुलसी, अदरक, गिलोय, सब अपने-अपने नुस्खे बताते है
कौनसा इलाज! पक्का नहीं पता कौनसा काम आता है

वो दिन गए सब भूल जब अभिवादन में हाथ मिलाए जाते थे
आज भारत के नमस्कार के संस्कार को पूरी दुनिया ने अपनाया है

साँस से साँस मिलाकर जीवनदान देते कभी सुना था
अब साँसों में समाकर कोरोना साँस छीन जाता है

कभी हिफाज़त-ए-हुस्न को परदा गिराया करते थे
आज रक्षा हेतु हरएक मुँह पर नक़ाब लगाएं फिरते है

गर रोकना हो विषाणु का संक्रमण होते हुए
सब मिलकर एहतियात बरतें, वरना गंभीर खतरा बन सकता है

कहाँ से पैदा हुआ यह कोरोना, या है कुदरत का कोई इशारा
जल्द ही इसका समाधान खोजें, हरकोई यही उम्मीद लिए बैठे है।

© Jalpa lalani ‘Zoya’ (सर्वाधिकार सुरक्षित)

धन्यवाद।

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होली है!

मुझे याद आती बचपन की वो होली

एक साथ निकलती हम बच्चों की टोली

रंग, गुलाल, पानी के गुब्बारे, और पिचकारी

कर लेते थे अगले दिन सब मिलके तैयारी

रंग-बेरंगी कपड़े हो जाते

जैसे इन्द्रधनुष उतर आया धरती पे

रंग जाते थे संग में सब के बाल

ज़ोरो ज़ोरो से रगड़ के लगाते गुलाल

बाहर निकलते ही सब को डराते

किसीके घर के दरवाज़े भी रंग आते

सामने देखते बड़े लड़को की गैंग

सब को चिड़ाते वो सब पी के भांग

वो सब के साथ मिलके गाते गाने

वो चिल्लाते जाते… होली है…!

© Jalpa lalani ‘Zoya’ (सर्वाधिकार सुरक्षित)

धन्यवाद।

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क्यों?

सहनशीलता पत्नी की ऐसी सीता सी तू
फ़िर दहेज की लालच में तुझे दुत्कारते हैं क्यों?

त्याग प्रेयसी का ऐसी राधा सी तू
फ़िर अपमानित की जाती है हर जगह क्यों?

सुंदरता स्त्री की ऐसी अहल्या सी तू
फ़िर एसिड से तेरी सुंदरता को नष्ट करते हैं क्यों?

पावनता पौधे की ऐसी तुलसी सी तू
फ़िर भ्रूण में तेरी हत्या की जाती हैं क्यों?

कोमलता फूल की ऐसी गुलाब सी तू
फ़िर जिंदा तुझे जलाया जाता हैं क्यों?

पवित्रता नदी की ऐसी गंगा सी तू
फ़िर तेरे चरित्र पर लांछन लगाया जाता हैं क्यों?

रस भक्ति का ऐसी मीरा सी तू
फ़िर लड़ती जब न्याय को तो आवाज़ दबाई जाती हैं क्यों?

पतिव्रता अर्धांगिनी की ऐसी उर्मिला सी तू
फ़िर आज भी सुरक्षित नहीं है नारी, आप ही बताए क्यों?

© Jalpa lalani ‘Zoya’ (सर्वाधिकार सुरक्षित)

Note: यह रचना प्रकाशित हो चुकी है और कॉपीराइट के अंतर्गत आती है।

धन्यवाद।

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कल हो न हो

आज बरसों बाद फ़िर से वो दिन आया था, 

मेरी दोस्त ने मिलने का आयोजन बनाया था। 

खो गये थे वक़्त के भवँर में दोनों, 

जब मिले भाव-विभोर बन गए दोनों। 

ये एक दिन सिर्फ़ हमारी दोस्ती के नाम, 

पूरे करने है वो सारे अधूरे अरमान। 

फ़िर क्या पता कल हो न हो….. 

आहना के साथ शुरू हुआ सुन्दर दिन हमारा, 

अभी तो साथ बिताना है दिन सारा। 

अभी भी था उसमें वहीं बचपना, 

ज़िद थी उसकी मेरे हाथ का खाना। 

अब जल्दी तैयार हो बाज़ार भी है जाना, 

उसका हमेशा से था हर बात में देरी करना। 

ये लेना है, वो लेना है करते करते पूरा बाज़ार घूम लिया, 

फ़िर भी मैं खुश थी ना जाने फ़िर कब मिले ये खुशफहमिया। 

फ़िर क्या पता कल हो न हो….. 

अब कितनी करनी है ख़रीदारी मुझे भूख लगी है भारी, 

क्या पता था एक दिन यही बातें, यादें बनेगी सुनहरी। 

अभी तो कितने ईरादे है, है कितनी ख्वाहिशें, 

आज पूरी करनी है मेरी दोस्त की हर फ़रमाइशें। 

पहली बार सिनेमा देखने गये साथ, 

इतने सालों बाद आज पूरी हुई हसरत। 

फ़िर क्या पता कल हो ना हो….. 

वो साम भी कितनी हसीन थी 

दोस्त के साथ समुद्र की लहरे थी

फ़िर से बच्चे बन गये थे फ़िर से रेत में घर बनाये थे 

फ़िर से कागज़ की कश्ती बहाई थी। 

उफ्फ़! ये रात को भी इतनी जल्दि आना था, 

दोनों को अपने अपने घर वापस भी तो जाना था। 

नहीं भूल पाएंगे वो पल, वो एक दिन को, 

साथ ख़ूब हँसे दोनों, भेट कर रो भी लिए दोनों। 

फ़िर क्या पता कल हो न हो….. 

© Jalpa lalani ‘Zoya’ (सर्वाधिकार सुरक्षित)

Note: यह रचना प्रकाशित हो चुकी है और कॉपीराइट के अंतर्गत आती है।

शुक्रिया।