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कुछ क़समें झूठी सी

इज़हार-ए-इश्क़ में कुछ क़समें झूठी सी उसने खाई थी,
यक़ीन नहीं आता, क्या मोहब्बत भी झूठी दिखाई थी?

सरेआम नीलाम कर दिए उसने मेरे हर एक ख़्वाब को,
जिसने मेरे दिन का चैन औ मेरी रातों की नींद चुराई थी।

जिसे समझ बैठी थी मैं आग़ाज़-ए-मोहब्बत हमारी,
दरअसल वो तो मिरे दर्द-ए-दिल की इब्तिदाई थी।

यूँ तो नज़रअंदाज़ कर गई मैं उसकी सारी गलतियां,
मगर क्या अच्छाई के पीछे भी छुपी उसकी बुराई थी!

अब कैसा गिला और क्या शिकायत करूँ उस से!
जब दोनों के मुक़द्दर में ही लिखी गई जुदाई थी।

उसकी इतनी बे-हयाई और बेवफ़ाई के बावज़ूद भी,
माफ़ कर दिया उसे, ये तो ‘ज़ोया’ की भलाई थी।

© Jalpa lalani ‘Zoya’ (स्वरचित)

सर्वाधिकार सुरक्षित

शुक्रिया🙂

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© Jalpa lalani ‘Zoya’

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आग़ाज़-ए-शायरी

मेरी ज़िंदगी में तुम हो तो सब है
तुझसे शुरू मेरी सहर औ शब है
सजदा-ए-इश्क़ में सर झुका दूँ
कि मेरे लिए तो तू ही मेरा रब है।

★★★★★★★★★★★★★★★

है एक छोटी सी आशा, ऊँचे आसमाँ में उड़ना है स्वछंद,
है यही एक अभिलाषा, कोई कतरे ना मेरे ख़्वाबों के पंख।

★★★★★★★★★★★★★★★

कदम से कदम मिला के प्रेम डगर पर चलना है
हाथों में हाथ डाल के इसे कभी ना छोड़ना है
सफ़र-ए-मोहब्बत में बिछे हो चाहे लाखों शूल
आए कितनी भी रुकावटे मंज़िल को हमें पाना है।

★★★★★★★★★★★★★★★

इस जहाँ की नज़रों में बेनाम सा हमारा रिश्ता है,
है ये तड़प कैसी! कैसा रूह  के बीच वाबस्ता है!
हसरतें दम तोड़ रही हैं अब आहिस्ता आहिस्ता,
अवाम की फ़िक्र नहीं, तुझ से ही  मेरा वास्ता है।

★★★★★★★★★★★★★★★

हिज्र-ए-यार में दिन काट लिए उसकी यादों के सहारे,
आरज़ू-ए-विसाल-ए-यार में हर रात ख़्वाबों में गुजारे।

★★★★★★★★★★★★★★★

उर्दू शब्दों के अर्थ:- शब = रात / वाबस्ता = संबंध / हिज़्र-ए-यार = यार की जुदाई / आरज़ू-ए-विसाल-ए-यार = यार से मिलन की उम्मीद

© Jalpa lalani ‘Zoya’ (स्वरचित / सर्वाधिकार सुरक्षित)

शुक्रिया

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इन्डिया फ़िर से भारत बन गया

इन्डिया फ़िर से भारत बन गया।

आज फ़िर से भारतीय नृत्य मंच पर छा गया,
आज फ़िर से भारतीय संगीत हर कोई गा रहा।

इन्डिया फ़िर से भारत बन गया।

कला के क्षेत्र में भारतीय कला की है बोलबाला,
आज झांसी की रानी बन गई हैं हर भारतीय बाला।

इन्डिया फ़िर से भारत बन गया।

आज फ़िर से विदेशों में भारत देश आगे आ गया,
नासा में भारत का वैज्ञानिक आज सफलता पा गया।

इन्डिया फ़िर से भारत बन गया।

आज फ़िर से आयुर्वेद विदेशियों ने भी है अपनाया,
सिर्फ़ भारत में नहीं पूरे विश्व ने योग दिवस है मनाया।

इन्डिया फ़िर से भारत बन गया।

आज फ़िर से संस्कृत को अभ्यासक्रम ने है अपनाया,
देखो ओलंपिक में भारत की हॉकी टीम का दबदबा है छाया।

इन्डिया फ़िर से भारत बन गया।

एक दिन ऐसा आएगा जब भारत फ़िर से इतिहास बनाएगा,
तब सिर्फ़ दो दिन नहीं पूरा साल भारत जश्न मनाएगा।

इन्डिया फ़िर से भारत बन गया।
इन्डिया फ़िर से भारत बन गया।

© Jalpa lalani ‘Zoya’ (स्वरचित)

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आप सभी को गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ।

🇮🇳जय हिन्द जय भारत🇮🇳

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पुरानी यादों की चादर

ख़ुशी, ग़म, प्रेम, धोखे के टुकड़े मिलाकर,
बुन ली है मैंने पुरानी यादों की चादर।

सुराख़ से सर्द हवा झाँकती, मैली, फटी सी,
फिर भी गर्माहट देती पुरानी यादों की चादर।

जब सितम ढाए तेज़ धूप और गर्म हवा,
अंगारों सी तपती जमीं पर बनती मेरा बिस्तर।

कभी सताए बुरे ख़्वाब, हो तन्हाई महसूस,
पुरानी यादों की चादर ओढ़ लेती हूँ लपेटकर।

ख़ामोशी से जब बहता है अश्कों का सैलाब,
बन जाती माँ का आँचल पुरानी यादों की चादर।

© Jalpa lalani ‘Zoya’ (स्वरचित)

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धन्यवाद

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तारीफ़-ए-हुस्न

सुनहरी लहराती ये ज़ुल्फ़ें तिरी और ये शबाब,
कोमल नाज़ुक बदन तिरा जैसे महकता गुलाब।

बैठ गया तू सामने तो साक़ी की क्या ज़रूरत,
सुर्ख़ थरथराते ये लब तिरे जैसे अंगूरी शराब।

सहर में जब तू लेता अंगड़ाई ओ मिरे सनम,
तुझे चूमने फ़लक से उतर आता है आफ़ताब।

रौशन कर दे अमावस की काली अँधेरी रात भी,
मिरा हसीं माशूक़ जब रुख़ से उठाता है हिजाब।

तारीफ़-ए-हुस्न लिखने को बेताब है मेरी कलम,
ग़ज़ल क्या! ‘ज़ोया’ तुझ पे लिख दूँ पूरी किताब।

© Jalpa lalani ‘Zoya’ (स्वरचित)

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शुक्रिया

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कुछ शाम

तेरी ज़ुल्फ़ तले राहत देती हैं कुछ शाम,
तन्हाई में प्यास बुझाते तेरे यादों के जाम।

तेरी झुकी आँखों से फैला गहरा काजल,
लिख देता है मेरे दिल पर इश्क़ का पैगाम।

अंदाज़-ए-गुफ़्तगू तेरा दिल पर करता वार,
जब तूम भेजती हो यूँ इशारों से सलाम।

छूती है जब तेरे मीठे लबों से चाय,
दूर कर देती है मेरी दिन भर की थकान।

शाम-ओ-सहर दिल के कोरे काग़ज़ पर,
लिखता हूँ बस तेरा ही इक नाम।

चला दे गर मेरे दिल पर तू हुकूमत,
ये नाचीज़ बन जाए ताउम्र तेरा ग़ुलाम।

© Jalpa lalani ‘Zoya’ (स्वरचित)

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शुक्रिया

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चल दूर कहीं

चल इस दुनिया से दूर कहीं हम दोनों चले जाते हैं,
नदी से मोहब्बत और फल से मीठा रस लाते हैं।

आसमाँ को चादर और जमीं को बिछौना बनाते हैं,
सूरज की रोशनी और ठंडी हवा से सुकून पाते हैं।

फूलों से खुशबू और चाँद से चाँदनी चुरा लाते हैं,
चलो उस जन्नत में जाकर आशियाना बनाते हैं।

© Jalpa lalani ‘Zoya’ (स्वरचित)

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शुक्रिया

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नया साल मुबारक हो

कुछ डायरी के पन्ने भरेंगे इस साल में

पिछले बरस कई कोरे कागज़ छूट गए थे।

अब के बरस दिल के जज़्बात को बयां करना है कलम से

पिछले साल तो स्याही ही ख़त्म थी कलम में।

नये साल में कुछ नये दोस्त बन गए हैं

तो पिछले बरस के दोस्तों से कभी कभी बातें होती है।

कुछ दर्द चिल्ला उठे थे पिछले बरस में

अबके साल खुशियों की कविताएँ गाएंगे।

बहुत कुछ अधूरा रह गया पिछले साल में

बहुत ख्वाहिशें लेके दाखिल हुए हैं इस साल में।

बुरे लम्हे की कड़वी यादों को दफन कर दी है बंजर जमीं में

उन खूबसूरत यादों को जमा कर आए हैं बैंक के खाते में।

पिछले बरस में अब मुड़कर मत देखो

चल पड़ो आगे नया साल सब को मुबारक हो।

© Jalpa lalani ‘Zoya’ (स्वरचित)

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Happy New Year💝🎉

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ईश्वर का रूप

ढूँढने उसको भटके, हर मानव दरबदर,
कभी झाँके धरा कभी ताके ऊँचा अम्बर।

कभी तलाशें संसार में कभी पूजे पत्थर,
गहराई में जाकर, कभी नापे है समंदर।

कोई कहे संगीत में बसा कोई कहे स्वर,
खोजे उसे, है जो निराकार है जो नश्वर।

सोचे मानुष, तू कैसा होगा रे है मेरे ईश्वर!
पूछे मानव, तू कैसा होगा रे है मेरे ईश्वर?

है वो शून्य में, उससे ही हुआ है विस्तार,
है वो कण कण में, किया है उसने प्रसार।

करे आत्मा प्रदीप्त, हरे मन का अंधकार,
वो परमपिता कराए सत्य से साक्षात्कार।

हर जीव पर बस उसका ही है अधिकार,
जीवन नैया को कराता है भवसागर पार।

सर्वव्यापी, सर्वशक्तिमान है सब में साकार,
है कितने रूप उसके, महिमा उसकी अपार।

अंतरतम से हर एक क्षण उसे स्मरण कर,
है तेरे आसपास ही कही वह प्रभु परमेश्वर।

न आदि न अंत उसका, है वो आत्मा अमर,
ध्यान जो करे निरंतर, पाले पूर्ण रूप ईश्वर।

© Jalpa lalani ‘Zoya’ (स्वरचित)

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धन्यवाद।

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मुश्किल हो सकता है

बेशक अकेले चलना मुश्किल हो सकता है
लेकिन इस भीड़ में साथ चलने वाला है कौन?

बेशक सच बोलना मुश्किल हो सकता है
लेकिन झूठ बोलने से आगे निकल पाया है कौन?

बेशक दुःख में हंसना मुश्किल हो सकता है
लेकिन खुशी में खुलकर हँसने वाला है कौन?

बेशक दुश्मन से लड़ना मुश्किल हो सकता है
लेकिन लड़ाई में साथ देने वाला दोस्त है कौन?

बेशक किसी को खोना मुश्किल हो सकता है
लेकिन साथ होने के बावजूद यहाँ साथ है कौन?

बेशक सपने को साकार करना मुश्किल हो सकता है
लेकिन बिना सपनों के यहाँ सोता है कौन?

बेशक किसी को माफ करना मुश्किल हो सकता है
लेकिन बदला लेके यहाँ जीत पाया है कौन?

बेशक मंजिल तक पहुंचना मुश्किल हो सकता है
लेकिन यहाँ आसानी से महान बन पाया है कौन?

बेशक जीवन की पहेली हल करना मुश्किल हो सकता है
लेकिन अंत से पहले इस पहेली को हल कर पाया है कौन?

© Jalpa lalani ‘Zoya’ (स्वरचित)

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धन्यवाद।

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Google

As we all know that Google is releasing its core update in December. तो इस पर मैंने एक शायरी बनाई है। उम्मीद है आप सबको पसंद आएगी।

गूगल ने अपने मूल नवीनतम करके जीवन और आसान कर दिया है
गूगल ने मानचित्र में संदेश विकल्प जोड़ने का अब एलान कर दिया है
दिल-ओ-दिमाग के अनसुलझे हर एक सवाल का देता है तुरंत जवाब
सब है इसके आधीन, लोगों ने गूगल को आधुनिक भगवान कर दिया है।

© Jalpa lalani ‘Zoya’ (स्वरचित)

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धन्यवाद।

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मरीज-ए-इश्क़

आजकल  कुछ अजीब  सा  मर्ज़ हुआ है,
मर्ज़ क्या, जैसे चुकाना कोई कर्ज़ हुआ है।

जाना हुआ मोहब्बत की दार-उल-शिफ़ा में,
बोला हक़ीम तुम्हें तो, दिल का दर्द हुआ है।

मर्ज़-ए-इश्क़  की  महंगी  पड़ी  है  तदबीर,
वस्ल-ए-यार  का इलाज  जो अर्ज़  हुआ है।

रूठा  है बीमारदार  इस मरीज-ए-इश्क़ का,
रूह-ए-जिस्म के पर्चे पर नाम दर्ज हुआ है।

ये साँसे  तो  चलती  है सनम  की खुशबू से,
क्या करें! मिरा महबूब  ही खुदगर्ज हुआ है।

परवा-ए-उम्मीद-ओ-बीम   न   कर   ‘ज़ोया’
इश्क़-ए-तबाही  में अक्सर ही  हर्ज हुआ है।

उर्दू शब्दों में अर्थ: मर्ज़=बीमारी/ दार-उल-शिफ़ा=अस्पताल/ तदबीर=उपाय/ वस्ल=मुलाक़ात/ बीमारदार=परिचारक /परवा-ए-उम्मीद-ओ-बीम=आशा की परवाह/ हर्ज=नुकशान

© Jalpa lalani ‘Zoya’ (स्वरचित)

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शुक्रिया।

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आगाज़-ए-शायरी (शेर-ओ-शायरी)

ख़ुदा के इशारों को समझ, हैं सही रब के फ़ैसले
मुश्किलात में वही देता है, तुम्हें सब्र और हौसले
इबादत, सख़ावत करके, कुछ नेकियां करले बंदे
सजदे में सर झुकाकर, गुनाहों से तौबा तू कर ले।

★★★★★★★★★★★★★★★★★

मुझे छोड़कर, बना दे तू अजनबी, अगर मुझसे नफ़रत है,
दूर मुझसे होकर, बढ़ती तेरी बेताबी, क्या ये तेरी उल्फ़त है!

★★★★★★★★★★★★★★★★★

बुझती नहीं मन की प्यास, नहीं होती तेरे इश्क़ की बरसात,
ढलती शब में करते उजास, तेरे साथ बिताए हरेक लम्हात।

★★★★★★★★★★★★★★★★★

बहुत कुछ बदलता हैं वक़्त के साथ
बदलते रहते हैं हालात और ख़्यालात
इतने आहत हो जाते हैं बाज़ औक़ात
कि ता-उम्र सुलगते रहते हैं जज़्बात
जो बुझा पाए इस दिल की आग
नहीं होती कभी वो इश्क़ की बरसात।

★★★★★★★★★★★★★★★★★

यूँ तो मेरा दिल बेशक़ तेरे दिए ज़ख्मों से मज़लूम है,
दिल चीर के देखना अब भी तेरी जगह मुस्तहकम है।

★★★★★★★★★★★★★★★★★

उर्दू शब्दों के अर्थ: सख़ावत=दान / तौबा=माफ़ी / उल्फ़त=प्यार / शब=रात / लम्हात=वक़्त / बाज़-औक़ात= कभी कभी / मज़लूम=आहत / मुस्तहकम=अटल

© Jalpa lalani ‘Zoya’ (स्वरचित)

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शुक्रिया

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आगाज़-ए-शायरी (शेर-ओ-शायरी)

एहसास-ए-मोहब्बत जन्नत का सुकून देता है
हाँ ! आईने में महबूब का अक्स ज़ुनून देता है
जो तोड़ जाए दिल अक्सर वही रहता है याद
मरहम जो लगाता है ज़ख़्म भी यक़ीनन देता है।

★★★★★★★★★★★★★★★★★★

जज़्बात की चाशनी में एतबार का मावा मिल जाए
परवाह की खुशबू के साथ थोड़ा एहतराम घुल जाए
रंग और मेवा डालकर बढ़ जाती है मिठास इश्क़ की
बड़ी ही लज़ीज फिर मोहब्बत की मिठाई बन जाए।

★★★★★★★★★★★★★★★★★★

ज़िंदगी के उस  मोड़ पर अकेली मैं खड़ी थी
हौसले के औज़ार से मौत की जंग लड़ी थी
कुछ अजीब सी रोशनी को मैंने पास पाया था
बंदगी में ख़ुदा से जुड़ी मेरी रूह की कड़ी थी।

★★★★★★★★★★★★★★★★★★

ज़मीन-ए-दिल में दफ़न हैं अनसुनी शिकायतें
ग़म-ए-धूप से सूख गई हैं सारी अधूरी हसरतें
मुसलसल चल रही जहरीली मुसीबत की हवा 
लगता है ख़ुदा भी नहीं सुन रहा है मेरी मिन्नतें।

★★★★★★★★★★★★★★★★★★

क़ौस-ए-क़ुज़ह की कलम से
कुछ यादें लिखी हैं फ़लक पे
मुसलसल बरसती हैं बारिश
अक्सर सर-ज़मीन-ए-दिल पे।

★★★★★★★★★★★★★★★★★★

उर्दू शब्दों के अर्थ: अक्स=परछाई / क़ौस-ए-क़ुज़ह=इंद्रधनुष / मुसलसल=लगातार

© Jalpa lalani ‘Zoya’ (स्वरचित)

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शुक्रिया

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आगाज़-ए-शायरी (शेर-ओ-शायरी)

ग़म-ए-ज़िंदगी में  जीने की  चाहत होनी चाहिए,
तिजारत-ए-इश्क़ में प्यार की दौलत होनी चाहिए।

★★★★★★★★★★★★★★★★★★

माना ख़ार के बीच महकता गुलाब हो तुम,
बेशक ताउम्र पढ़ना चाहो वो किताब है हम।

★★★★★★★★★★★★★★★★★★

ख़्वाबों की बंद खिड़की खोल, वो सजा गया मेरी दुनिया,
हालात ने क्या दस्तक दी, उसने बदल दिया तौर तरीका।

★★★★★★★★★★★★★★★★★★

सच की पाठशाला में जब से इश्क़ है पढ़ लिया,
ख़ुदा-ए-पाक के नाम रूह पर इश्क़ लिख दिया।

★★★★★★★★★★★★★★★★★★

बस जाए दिल-ओ-दिमाग में हर लम्हा,
भर जाए किताब-ए-ज़ीस्त का हर पन्ना।

© Jalpa lalani ‘Zoya’ (स्वरचित)

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उर्दू शब्दों के अर्थ: तिजारत=व्यापार/ ख़ार=कांटा/ किताब-ए-ज़ीस्त= ज़िंदगी की किताब

शुक्रिया

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दीपावली दोहे

आप सभी को दीपावली के पावन पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं।💥🎆

मन के तम को दूर कर, जलाओ आज दीप।
जीवात्मा प्रज्वलित कर, जला लो अमरदीप।।१।।

जो घर हो नारी मान, लक्ष्मी आए उस द्वार।
रखें देह, मन, हिय साफ़, मिले वैभव अपार।।२।।

जलती बाती तम हरे, दीपक तो आधार
अमावस में उजास करे, दीपों का त्योहार।।३।।

बुराई पर अच्छाई की, विजय हुई थी आज।
निज बुराई को तज कर, कीजिए अच्छे काज।।४।।

रंगों से सजा हर द्वार, लाए घर में उमंग।
लहराती दीपक ज्योति, भरे मन में तरंग।।५।।

पर्व है दीवाली का, हुआ जगमग संसार।
शहीदों के नाम जलाए, एक दीपक इस बार।।६।।

© Jalpa lalani ‘Zoya’ (स्वरचित)

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धन्यवाद।

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ईद-ए-मिलाद-उन-नबी

ख़ुदा की बंदगी करके पाले नूर-ए-इबादत
शब-ओ-सहर कर तू सलीक़े से तिलावत
सजदा करके बदल लें अपनी किस्मत बंदे
आख़िरत में साथ देती इबादत की ताक़त।

ईद-ए-मिलाद-उन-नबी मुबारक।🌙🌠

© Jalpa lalani ‘Zoya’ (सर्वाधिकार सुरक्षित)

शुक्रिया

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दशहरा विशेष दोहे

सादर नमन पाठकों।🙏
आज दशहरा के पावन पर्व पर प्रस्तुत है मेरे द्वारा रचित दोहे।
आप सभी को दशहरा की हार्दिक शुभकामनाएँ।

इह बसत हैं सब रावण, ना खोजो इह राम।
पाप करत निस बित जाए, प्रात भजत प्रभु नाम।।

अंतर्मन बैठा रावण, दुष्ट का करो नाश।
हिय में नम्रता जो धरे, राम करत उहाँ वास।।

कोप, लोभ, दंभ, आलस, त्यजो सब यह काम।
रखो मुक्ति की आस, नित भजो राम नाम।।

पाप का सुख मिलत क्षणिक, अंत में खाए मात।
अघ-अनघ के युद्ध में, पुण्य विजय हो जात।।

© Jalpa lalani ‘Zoya’ (सर्वाधिकार सुरक्षित)

धन्यवाद।

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कोरोना

इक और आविष्कार किया खाने के शौकीन चीन ने
सीमाओं से निकलकर खतरा फैलाया पूरे विश्व में

तुलसी, अदरक, गिलोय, सब अपने-अपने नुस्खे बताते है
कौनसा इलाज! पक्का नहीं पता कौनसा काम आता है

वो दिन गए सब भूल जब अभिवादन में हाथ मिलाए जाते थे
आज भारत के नमस्कार के संस्कार को पूरी दुनिया ने अपनाया है

साँस से साँस मिलाकर जीवनदान देते कभी सुना था
अब साँसों में समाकर कोरोना साँस छीन जाता है

कभी हिफाज़त-ए-हुस्न को परदा गिराया करते थे
आज रक्षा हेतु हरएक मुँह पर नक़ाब लगाएं फिरते है

गर रोकना हो विषाणु का संक्रमण होते हुए
सब मिलकर एहतियात बरतें, वरना गंभीर खतरा बन सकता है

कहाँ से पैदा हुआ यह कोरोना, या है कुदरत का कोई इशारा
जल्द ही इसका समाधान खोजें, हरकोई यही उम्मीद लिए बैठे है।

© Jalpa lalani ‘Zoya’ (सर्वाधिकार सुरक्षित)

धन्यवाद।